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गुरु अंगद देव जी

दिव्य गुण: आज्ञाकारिता · गुरु 1539 से 1552 तक
गुरुमुखी के प्रवर्तक

जीवन और योगदान

उनका जन्म 1504 में हुआ। गुरु अंगद देव जी ने गुरुमुखी (पंजाबी की लिपि) का आविष्कार किया और इसे सभी सिखों तक पहुँचाया। गुरु ग्रंथ साहिब जी की वाणी गुरुमुखी लिपि में लिखी गई है। उन्होंने बच्चों की शिक्षा में गहरी रुचि ली और उनके लिए कई पाठशालाएँ खोलीं।

Guru Angad Dev Ji

युवाओं के लिए उन्होंने मल्ल अखाड़े की परंपरा आरंभ की, जहाँ शारीरिक तथा आध्यात्मिक अभ्यास दोनों होते थे। उन्होंने 63 सलोक भी रचे, जो गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं। उन्होंने गुरु नानक साहिब द्वारा पूर्व में आरंभ की गई 'गुरु का लंगर' संस्था को लोकप्रिय बनाया और विस्तार दिया।

Divine Reflections








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